Wednesday, June 15, 2011

। मस्ती की आदत डाल लें।

। मस्ती की आदत डाल लें। मस्त स्वभाव के बिना आप छोटी-छोटी बातों पर बड़ी चिन्ता करने लगेंगे, चिड़चिड़ें होकर लड़ने लेगेंगे, दुःखी रहने लगेंगे और रक्तचाप आदि के शिकार हो जायेंगे। कुछ लोग छोटी-सी मिट्टी की बमी पर ऐसे चढ़ते हैं, जैसे पर्वत पर चढ़ रहे हों। छोटी-सी बात पर ऐसी चिन्ता करते हैं, जैसे घोर संकट आ गया हो। मस्ती, प्रभु के प्रति भक्ति और मनुष्यों के प्रति अथाह प्रेम जगाने से स्वयं आविर्भूत हो जाती है।
व्यर्थ ही निरन्तर गम्भीरता, गारिमा का भारी बोझ सिर पर उठाये हुए हम खिलखिलाकर हँसना भूल गये तथा बात-बात पर चिढ़ने लगे। चिढ़ानेवाला व्यक्ति दुष्ट और चिढ़नेवाला मूर्ख होता है। छोड़ो, छोड़ो चिढ़ना और चिढ़ाना। अपना लो हँसना और हँसाना। हास्य और विनोद को स्वभाव का अँग बना लो। कटुता का उत्तर मधुर भाषा में देना सीख लो।
सदा रोते रहने का स्वभाव मनुष्य को दयनीय बना देता है। ऐसे व्यक्ति के साथ कौन बैठना पसंद करेगा जो दुःख की गाथा ही सुनाता रहता है तथा रोता ही रहता है? यदि कभी रोना भी पड़े तो प्रभु के समक्ष अकेले रो लेना चाहिए। कभी-कभी रोना ठीक हो सकता है, किंतु सदा रोते ही रहना तो जीवन को बोझ बना देता है।
अपमान का भय, हानि का भय, रोग का भय, मृत्यु का भय, अनेक प्रकार के भय हमें घेरे ही रहते हैं तथा सारा जीवन यों ही रोते, डरते बीत जाता है। भय बार-बार मन को विचलित कर देता है। भय भूखे भेड़िये की भाँति मनुष्य के स्वास्थ्य और सुख को खा जाता है। चिन्ता हमें पंगु बनाये रखती है। काल्पनिक चिन्ताओं में हम अपनी जीवन-शक्ति का क्षय करते ही रहते हैं। किसी मनुष्य के कोसने (दुर्भावना, ईर्ष्या, क्रोधावेश इत्यादि के कारण दुर्वचन कहने) पर ध्यान ही नहां देना चाहिए। किसी के कोसने से कभी कुछ नहीं बिगड़ता है, बल्कि कोसनेवाले का ही पुण्य क्षीण होता है। भय के कारण अपशुकन भूत-प्रेत आदि के भ्रम में पड़कर किसी तिथि को, कभी किसी समय को, कभी किसी संख्या को, कभी किसी पशु को, कभी किसी व्यक्ति को अशुभ कह देते हैं तथा बच्चों के कोमल मन पर भी कुप्रभाव डाल देते हैं। संसार में असंख्य ज्योतिषी और हस्त-रेखा-विशारद कहलानेवाले चतुर व्यक्ति दुःखीजन के दुःख का अनुचित लाभ उठाकर, उन्हें भयभीत कर उनका शोषण कर रहे हैं। जिन्हें अपने भविष्य का ज्ञान नहीं है, वे दूसरे के भविष्य का कथन करते हैं! मनुष्य का भविष्य हाथ की रेखाओं और ग्रहों द्वारा कदापि बाँधा नहीं जा सकता है। मनुष्य की इच्छा-शक्ति और पुरुषार्थ मनुष्य का भविष्य बनाती है, न कि उसके हाथ की रेखा और ग्रह। समझदार व्यक्ति ग्रह के चक्र से छूटकर ग्रहपति परमात्मा से नाता जोड़ता है। परमात्मा सर्वसमर्थ है। अज्ञात (ग्रहों और रेखाओं) के कुचक्र से छूटकर कर्म की ओर बढ़ना विवेक हैं। अनिश्चित का भरोसा करने से मन दुर्बल होता है। समस्या का उपाय तो पुरुषार्थ करना है। प्रारब्ध, नियति अथवा दैव अपना काम करे और हम अपना काम करें। हमारा श्रेष्ठ पथप्रदर्शक हमारा अपना उत्साह है। भविष्य-वक्ताओं के कुचक्र में फँसना अविवेक है, भटकना है। अन्धविश्वास में पड़ना बुद्धि का अपमान है। बृहस्पति स्मृति में लिखा है कि शास्त्र की बातों को भी बुद्धिरहित होकर मानने से धर्म-हानि होती है।
केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्त्तव्यो विनिर्णयः।
युक्तिहीनविचारे तु धर्महानिः प्रजायते।
अर्थात् केवल शास्त्र का आश्रय लेकर कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। बिना युक्ति सोचे हुए विचार करने पर तो धर्महानि हो जाती है। इसी प्रकार की एक अन्य उक्ति हैः
यस्त नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति॥
अर्थात् जिसके पास प्रज्ञा (विवेक, विचार) नहीं है, शास्त्र उसका क्या उपकार कर सकता है? नेत्रों से विहीन व्यक्ति का दर्पण भी क्या उपकार करेगा? नेत्रों को बंद करके मनुष्य प्रकाशित लैम्पपोस्च से भी टकरा जाता है, दिन में भी भटक जाता है। सच्चा बुद्धिजीवी कभी प्रज्ञा-नेत्र को मूँदकर नहीं बैठता है।

मानव को स्वस्थ एवं सुखी रहने के लिए

मानव को स्वस्थ एवं सुखी रहने के लिए ही वह स्वर्णिम अवसर मिला है। जीवन से बढ़कर अधिक मूल्यवान् कुछ भी नहीं है। यदि आपका सारा धन लूट गया और जीवन शेष बचा है तो कुछ भी नहीं लूटा और सब कुछ शेष रह गया। जीवन का महत्व समझना चाहिए। जीवन में रुचि लेना आद्य एवं सर्वप्रथम आवश्यकता है। धर्म, कर्म, ज्ञान, योग, भोग, त्याग, मुक्ति इत्यादि सब कुछ बाद में है। जो जीवन में रुचि नहीं लेता है, उसे जीने का अधिकार नहीं हैं तथा वह तो जिन्दगी के बोझ ढोनेवाला दयनीय पशु है। अपने जीवन को जैसा भी है, स्वीकार कर लेना चाहिए तथा अपनी परिस्थितियों को कोसकर अपने लिए नरक बना लेना नासमझी है। जीवन का पुजारी अवश्य ही सुख को प्राप्त कर लेता है। जीवेष्णा (जीने की इच्छा) निराशा को दूर करने के लिए महौषधि होती है। जीवन के सौंदर्य एवं आकर्षण को न जाननेवाले मूढ़जन जीवन से ऊब जाते हैं। अधिक-से-अधिक लोगों के लिए, विशेषतः अधिक-से-अधिक दीन-दुःखी जन के लिए, अधिक-से-अधिक उपयोगी बनने पर आपके जीवन में एक विचित्र माधुर्य उत्पन्न हो जायगा और आपका जीवन एक मधुर संगीत बन जायगा। जीवन की सरगम पर कोई बेसुरा राग न अलापें, एक मधुर संगीत गायें। मानव भ्रांत विचारों तथा मूर्खतापूर्ण कर्मों के कारण इधर-उधर भटकता ही रहता है। ईश्वरतत्व हमें सुख का रास्ता दिखा रहा है, किंतु हम तो जान-बूझकर आँखें बंद किये हुए बैठे हैं। धरती को स्वर्ग बनाने के प्रयत्न द्वारा ईश्वर को प्राप्त करो। उठो, जागो, आगे बढ़ो!
अनेक बार मनुष्य धन, बल इत्यादि के अभाव पर तथा अपने दुर्गुणों पर अनावश्यक ध्यान देने के लिए पतनकारक हीनभावना से ग्रस्त हो जाता है, किंतु आत्मसम्मान को जगाकर वह उससे भी अवश्य मुक्त हो सकता है। जीवन में कुछ अभावों के कारण अपने को हीन तथा दुर्गुणों के कारण अपने को निकृष्ट मान बैठना अविवेक हैं, अपने साथ शत्रुता करना है, अपना दम घोंटना है। हममें कुछ गुण भी तो हैं, उन्हें अनदेखा क्यों कर दें? हम अपनी सत्ता को नकारकर अपनी ही हानि क्यों कर लें?आत्मसम्मान को जगाकर मनुष्य निश्चय ही अपनी समस्त हीनता पर विजय पा सकता है। वास्तव में आत्मसम्मान आत्मविश्वास का जनक होता है तथा आत्मसम्मान के साथ आत्मविश्वास भी जाग जाता है। आत्मसम्मान एवं आत्मविश्वास के बिना मनुष्य दयनीय तथा उनसे युक्त होकर सर्वसमर्थ हो जाता है। आत्मसम्मान एवं आत्मविश्वास से ही मनुष्य को मनुष्य की प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। आत्मसम्मान का भाव मनुष्य में सदगुणों का प्रेरक तथा दुर्गुणों का प्रभावी नियन्त्रक होता है। सणों के विकास द्वारा ही मनुष्य दुर्गुणों पर विजय पा सकता है।
वास्तव में प्रत्येक मनुष्य में महानता की अनन्त सम्भावनाएँ छिपी पड़ी हैं। किंतु मनुष्य को अपनी महत्ता पहचानकर उसके अनुरुप चिन्तन और कर्म भी तो करना चाहिए। कोई मनुष्य किसी एक दिशा में महान् हो सकता है तो कोई अन्य मनुष्य किसी दूसरी दिशा में आगे बढ़ सकता है। जिस मनुष्य के पास जो कुछ गुण या शाक्ति है, वह उसी को लेकर ऊँचा उठे। तभी उसकी सफलता और सार्थकता है। अनन्त शाक्तिमान् परमेश्वर का अंशभूत होने के कारण मनुष्य में अनन्त शक्तियों का भण्डार भरा पड़ा है तथा उसमें अनन्त उन्नति की सम्भावनाएं छिपी हुई हैं। अपनी निधि को बिना पहचाने तो राजा भी रंक ही है। मनुष्य अपनी अगणित प्रसुप्त शक्तियों को भूलकर दयनीय और उन्हें जगाकर समर्थ हो जाता है। अपनी शाक्तियों पर भरोसा करने की आवश्यकता है, उनके सदुपयोग करने और संकल्प लेने की आवश्यकता है, उत्तम लक्ष्यों की ओर चल पड़ने की आवश्यकता है, दृढ़ता और धैर्य की आवश्यकता है, आत्मविश्वास की आवश्यकता है। मनुष्य को कभी-कभी एकान्त में बैठकर आत्मविश्वास को जगाने का अभ्यास करना चाहिए और पग-पग पर सँभलने का निश्चय करना चाहिए। मनुष्य आत्मविश्वास को जगाकर ही संकटों को पार करता हुआ आगे बढ़ सकता है, ऊँचे उठ सकता है और महान् बन सकता है। आत्मविश्वास का अर्थ हैं अपनी समस्याओं को समझने और उनका समाधान करने की अपनी सामर्थ्य में विश्वास होना। मनुष्य विवेक के सहारे अपने विलुप्त आत्मविश्वास को जगा सकता है।
हमारे विचारों, आशाओं, निराशाओं, भय, घृणा, क्रोध आदि मनोवेगों का प्रभाव हमारे शरीर के अंग-प्रत्यंग पर पड़ रहा है, हमारे स्वास्थ्य और मनोदशा पर पड़ रहा है, शरीर की एक-एक कोशिश (सेल) पर पड़ रहा है; हृदय और मस्तिष्क पर पड़ रहा है, रक्त पर पड़ रहा है, स्नायुतंत्र (नर्वस-सिस्टम) पर पड़ रहा है। हमारे विचारों का प्रभाव हमारे व्यक्तित्व में झलक रहा है। जितनी बार भी हम चिंता से घबरा उठते हैं अथवा उत्तेजित होकर व्यर्थ ही घृणापूर्ण क्रोध में भड़क उठते हैं, उतनी बार हम मानों अपने ही शरीर में, मस्तिष्क से तथा प्रत्येक सेल से ही लड़ बैठते हैं। प्रत्येक चिन्ता और भय हमारे मन और स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव छोड़कर जाते हैं। चिंता और भय हमारे स्नायु-तंत्र में कम्पन तथा रक्त में एक विषैला तत्व उत्पन्न कर देते हैं जो हमें जर्जर कर देते हैं। मानसिक तनाव से बृहदांत्र शोथ (कोलाइटिस), उदरव्रण, सिरदर्द, कमरदर्द, हृदयघात आदि महारोग उत्पन्न हो जाते हैं। मानसिक तनाव का उपाय आत्मविश्वास ही तो है। आत्मविश्वास जगाकर आगे बढ़ें। सब लोग आत्मविश्वास से ही आगे बढ़ते हैं अतएव किसी व्यक्ति का खोया हुआ आत्मविश्वास लौटा देना उसकी सबसे बड़ी सेवा एवं सहायता है। हताश होना अथवा हताश करना अक्षम्य अपराध है। जहाँ आत्मविश्वास है तथा प्रभु पर विश्वास है, वहाँ चिन्ता और भय न रह सकेंगे। भक्तिभाव से ओत-प्रोत होकर कबीर कहते हैं:
उस समरथ को दास हौं, कदै न होय अकाज।
पतिबरता नांगी रहै, वाही पुरुस को लाज॥
ईश्वरभक्त का विश्वास है कि उसका अकाज नहीं हो सकता है, क्योंकि ईश्वर सर्वसमर्थ है, किंतु यदि कुछ हानि हो भी जाय तो वह ईश्वर का ही प्रसाद है। ईश्वर-विश्वास के प्रकाश में चिंता का अन्धकार लुप्त हो जाता है।
धीरे-धीरे मस्ती को स्वभाव का अंग बना लें। मस्ती की आदत डाल ले

मानव को स्वस्थ एवं सुखी रहने

प्रत्येक व्यक्ति जीवन में सुख चाहता हैं तथा सुख-प्राप्ति की दिशा में दिन-रात प्रयत्न करता है। किन्तु कभी-कभी मानसिक तनाव मनुष्य को सुख से दूर हटा देता है। क्या हम इस तनाव से मुक्ति पा सकते हैं? अवश्य ही। क्या हम खोये हुए आत्मविश्वास को भी पुनः पा सकते हैं? हाँ, निश्चय ही।

आप जीवन के अस्तित्व और सुख की चाह को तो स्वीकार करते ही हैं, क्योंकि उनका प्रत्यक्ष अनुभव आपको होता है। पुनर्जन्म आदि के कुछ सिद्धांत तो विवादास्पद हो सकते हैं, वे सर्वमान्य नहीं है, किंतु वर्तमान को सुखमय बनाने की मनुष्य की लालसा एवं क्षमता तो निर्विवाद है। सर्वप्रथम चिन्तन और अवधारणा की इकाइयों के रूप में परस्पर जुड़ी हुई लगभग दस-बारह अरब कोशिकाओं से युक्त अत्यन्त संवेदनशील मानव-मस्तिष्क को व्यर्थ बोझ और तनाव से मुक्त रखने के उपाय करना अत्यन्त आवश्यक है। प्रत्येक मस्तिष्क-कोशिका (न्यूरोन) तंत्रिका निकाय नर्वस सिस्टम की एक अत्यन्त सूक्ष्म इकाई होती है जो जटिलताओं के कारण विराटतम संकलक (कम्प्यूटर) की अपेक्षा भी अनन्तगुणा विलक्षणा होती है। कोई भी दो न्यूरोन समान नहीं होते हैं तथा प्रत्येक न्यूरोन में लगभग दो करोड़ आर० एन० ए० अणु होते हैं, जिनमें से प्रत्येक जीव रसायन के चमत्कार से एक लाख प्रकार के प्रोटीन बना सकता है। चिन्ता और भय मानव के असीम शक्तिसम्पन्न मस्तिष्क को, अनावश्यक बोझ डालकर, सतत क्षीण बनाते रहते हैं। आज की सभ्यता इस दिशा में मानव के लिए एक अभिशाप बन गयी है। यदि आप निश्चय कर लें कि आपको चिंता एवं भय से मुक्त होकर सुखी रहना है तो आपका जीवन सुखमय हो जायगा। आप विश्वास करें कि प्रकृति के सबसे बड़े चमत्कार, मानव-मस्तिष्क, में समस्याओं को चुनौती देने और संकटो से जूझने की अद्भुत क्षमता है, किंतु आपका संकल्प करना आवश्यक है। अतः आप आज ही और अभी वज्र संकल्प कर लें कि आपको सदा सुखी होना है और आप निश्चित रूप से सुखी हो सकते हैं। बस, अपने विचारों एवं सोचने के तरीकों में परिवर्तन लाने तथा जीवन के प्रति दृष्टिकोण को बदल डालने की आवश्यकता है। धैर्य से काम लें और इस संकल्प को पूरा करके छोड़ें।'कारज धीरे होत है काहे होत अधीर। समय पाय तरुवर फरै, केतिक सींचौ नीर।' धैर्य रखो। धैर्य की महिमा अनन्त हैं। धैर्य के साथ विश्वास एवं आशा को भी दृढञ रखना सीखें। धैर्य धारण करना कठिन होता है, किंतु उसके फल मीठे होते हैं।
जीवन का सार और सुख का रहस्य दो आँसुओं में निहित हैं-दूसरों के गम के आँसू पोंछकर प्रसन्नता का एक आँसू अर्जित करना तथा दूसरा आँसू एकांत में भाव-विभोर होकर प्रभु के प्रति कृतज्ञतापूर्वक बहाना कि उसने आपको सेवा करने का अवसर तथा उसके लिए क्षमता प्रदान की। बस, इतना ही समस्त धर्मों का संदेश हैं।
आज 'प्रोग्रेसिव' के नाम पर ईश्वरतत्व को नकारना एक फैशन हो गया है। ज्यों-ज्यों भौतिक प्रगति हो रही है, मानव की मानवता विलुप्त होती जा रही है। कलह और अशांति व्यापक रोग की भाँति फैलते जा रहे हैं। अतएव आध्यात्मिकता की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। अशांति का उपाय आध्यात्मिकता है। धर्मों के नाम पर परस्पर घृणा का प्रचार करनेवाले तथा युद्ध भड़कानेवाले धर्म के तत्व एवं उद्देश्य को नहीं समझते हैं। संत किसी एक धर्म के खूंटे से नहीं बँधते हैं और सत्य का सत्कार करते हैं, वह चाहे जहाँ भी प्राप्त हो। एक सच्चा मानव मंदिर, गिरजा, गुरुद्वारा, मस्जिद को समान रुप से पवित्र मानता है तथा उसे अनेक मार्गों (धर्मों) के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। अपनी व्यक्तिगत अनुभूति के आधार पर ईश्वरतत्व को पहचानना तथा अपने स्वभाव के अनुसार उसके साथ एक व्यक्तिगत नाता स्थापित करना ईश्वर-प्राप्ति का श्रेष्ठ मार्ग है। देश, भाषा और ग्रंथ में बाह्य पवित्रता खोजनेवाले लोग जरा आन्तरिक भावनाओं की पवित्रता का भी तो महत्व समझें। ईश्वर का संबंध भावना से ही है, भाषा आदि से नहीं। धर्म के नाम पर घृणा-प्रचार एक हास्यास्पद विडम्बना है।
ईश्वर सच्चिदानन्द है, असीम शक्ति का भंडार है। ईश्वर हमारे लिए एक अनन्त एवं अक्षय शक्तिस्रोत है। यदि आपका आत्मविश्वास विलुप्त हो चुका है, आप प्रभु भक्ति के द्वारा उसे पुनः प्राप्त कर सकते हैं। भावपूर्ण प्रार्थना करना एक विचित्र संबल देता है। हम मंत्रबल को भी विस्मृत कर चुके हैं। मंत्रजप से अद्भुत शक्तियाँ जाग जाती हैं। दो-चार दिन श्रद्धापूर्वक एक मंत्र का जप करके ही हमें इसका अनुभव हो सकता है। मन्त्रजप के सहारे सारी भीतरी कुण्ठाएं परिसमाप्त हो सकती हैं तथा नूतन शक्तियों का प्रादुर्भाव हो सकता है। खेद, हम ईश्वरीय शक्तियों को भुला बैठे हैं। जरा मन के द्वार खोलें! शक्ति का एक असीम, अथाह भण्डार हमारे भीतर सुरक्षित हैं। हमें उससे संबंध जोड़ने की आवश्यकता है। सर्वशक्तिमान् परमेश्वर असीम शक्ति का अक्षय स्रोत हैं। हमें प्रभु की दयामयता में दृढ़ आस्था रखनी चाहिए। प्रभु की सजीव उपस्थिति को अपने चारों ओर देखना और अनुभव करना चाहिए। ईश्वरीय शक्ति में आस्था रखना कठिन हैं, किंतु उसके लाभ अकल्पनीय होते हैं। हम उसके साथ संबंध जोड़कर शक्ति एवं शान्ति पाने के अधिकारी हैं। पिता की विरासत पुत्रों को सुलभ हो सकती है; किंतु हम नाता तो जोड़ें।
जीवन में पल-पल नव-निर्माण हो रहा है। उत्साह की तरंगों से मन को तरंगित एवं आप्लावित कर दें। निराशा हमारे स्वभाव का अंग नहीं है, विजातीय हैं। निराशा को भगाओ, आशा को जगाओ, आज और अभी जगाओ। जीवन का यही संदेश है। हमारे मन में कोई पुकार-पुकार कह रहा है कि मानव को जीवन सुख से रहने के लिए मिला है, सुख मानव का जन्मसिद्ध अधिकार है। यह सृष्टि सुखप्रधान हैं, दुःखप्रधान नहीं है और मानव न केवल स्वभाव से सुख चाहता है, वह सुख पाने में सक्षम भी है। सुखवृत्ति को ठीक प्रकार से जगाकर मनुष्य खोये हुए सुख को पुनः पा सकता है।
जीवन एक सुनहला वरदान है। मानव को स्वस्थ एवं सुखी रहने के लि

Saturday, June 11, 2011

ॐ सांई आसारामजी बापू!!!

ॐ सांई आसारामजी बापू!!!

नाज़ करूँ मैं खुद पर सांई,
सब कुछ वार दूँ तुझ पर सांई,
जब से प्यार मिला तेरा,
सुंदर दीदार मिला तेरा,
सब कुछ पा लिया मैने सांई ,
दिल गद गद हो गया मेरा,
हे सांई,पाया दीदार जब से तेरा,
अब और कुछ रही ना इस मन की चाह,
सांई मैं दूँ सब कुछ तुझ पर वार,
किया तूने हम पतितो का उद्धार,
परमेश्वर ,तेरे इस रूप को,
मेरा करोङो बार नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार~~~

ॐ सांई आसारामजी बापू!!!

Friday, June 10, 2011

गुरु स्तुति

गुरु स्तुति~~~

गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द ~~
गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत~~

गुरु मेरा देऊ , अलख अभेऊ , सर्व पूज चरण गुरु सेवऊ
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत~~

गुरु का दर्शन .... देख - देख जीवां , गुरु के चरण धोये -धोये पीवां~~

गुरु बिन अवर नही मैं ठाऊँ , अनबिन जपऊ गुरु गुरु नाऊँ
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत~~

गुरु मेरा ज्ञान , गुरु हिरदय ध्यान , गुरु गोपाल पुरख भगवान्
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत~~

ऐसे गुरु को बल-बल जाइये .. आप मुक्त मोहे तारें~~

गुरु की शरण रहो कर जोड़े , गुरु बिना मैं नही होर
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत~~

गुरु बहुत तारे भव पार , गुरु सेवा जम से छुटकार
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत~~

अंधकार में गुरु मंत्र उजारा , गुरु के संग सजल निस्तारा
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत~~

गुरु पूरा पाईया बडभागी , गुरु की सेवा जिथ ना लागी
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत~~

बापू तुम्हारे चरणों मे

श्री बापू तुम्हारे चरणों मे, एकबार ठिकाना मिल जाये...
मैं जनम जनम गुण गाऊँगा, जीवन की बगिया खिल जाये...

भटको को राह दिखाते हो, हारे का साथ निभाते हो...
मैं हार गया खुद से मोहन, मुझे तेरा सहारा मिल जाये...
...
बिन तेरे सहारे साँवरिया, कोई खुद से नहीं लड़ सकता है...
तू जिसपर महर करे भगवन, वो जग मे निर्भय हो जाये...

मै जनम जनम गुण गाऊँगा, जीवन की बगिया खिल जाये...
श्री बापू तुम्हारे चरणों मे, एकबार ठिकाना मिल जाये...

Sunday, June 5, 2011

श्रद्धा के साथ गुरु

तेरी मौजूदगी का हर पल दवा होता है
तेरी मज़िल पे रखा हर कदम सवा होता है
जो जीता है तेरी महफिलों के सदके में
वह बुजुर्गवार भी नौज़वान होता है
तू झौंक दे अपनी इबादत का सुरूर
इसी आदत से अल्लाह महरबान होता है
“सभी को समर्पण और सद्भावना कि बधाइयाँ “
जो व्यक्ति श्रद्धा के साथ गुरु के शरणागत होकर अपने धर्म को जानकर अपने धर्म का आचरण करते हैं केवल वही व्यक्ति सभी पाप कर्मों से बच पाता है, धर्म पालन के बिना पाप कर्मों से बच पाना असंभव है।