Sunday, June 19, 2011

सगरे जगत में दूजा नहीं,

ॐ सांई आसारामजी बापू
सगरे जगत में दूजा नहीं,
मेरा इक तू साईं
रहना मुझको, संग संग तेरे,
बनके तेरी परछाई
लेके उमीदें तेरे दर पे
आते है सारे सवाली
मांगे मुरादें लेके जाएं
भर भर दामन खाली
मेरे मालिक मेरे दाता
भाग बना दे भाग्य विधाता
अब दुख सहा न जाता
सगरे जगत में दूजा नहीं,
मेरा इक तू साईं
रहना मुझको, संग संग तेरे,
बनके तेरी परछाई
तेरे चरणों की धुल उठाके,
माथे पर मैं लगाऊं
तेरी मिट्टी में जन्म लिया है,
तुझ में हे मिल जाऊं
चाहे बना दे चाहे मिटा दे,
जो चाहे वोह मुझको सज़ा दे
जीवन पार लगादे.
सगरे जगत में दूजा नहीं,
मेरा इक तू साईं
रहना मुझको, संग संग तेरे,
बनके तेरी परछाई

Wednesday, June 15, 2011

जिन्दगी की बेल

 हमें समझ लेना चाहिए की जिन्दगी की बेल के सभी अंगूर मीठे नहीं है; कुछ मीठे है और कुछ खट्टे भी हैं। दुःख और सुख जीवन के अविभाज्य अंग हैं, और हमें निराशा, अपमान एवं दुःख को जीवन का अपरिहार्य अंग मानकर स्वीकार करना पड़ेगा, अन्यथा हम आगे नहीं बढ़ सकते हैं और शोकसन्तप्त होकर विनष्ट हो जायेंगे। विवशता एवं असाध्यता के साथ समझौता कर लेना, उसे सहर्ष अपना लेना बुद्धिमत्ता है। जीवन में यथार्थता को स्वीकार कर लेना और उसके साथ समायोजन (एडजस्टमेण्ट) करके संतोष धारण कर लेना सुख-शांति की दिशा में एक आवश्यक पग है। यह एक तथ्य है कि हम किसी भी व्यक्ति तथा किसी भी परिस्थिति में पूर्णतः संतुष्ट नहीं होते। समझौता तो पग-पग पर आवश्यक होता है। सुखी एवं स्वस्थ जीवन अपने साथ, परिवार के साथ समझौतों की एक श्रृंखला है। जीवन का उदगम भी स्वयं समझौता है। समझौता जीवन का प्रमुख सिद्धांत है। किसी भी नारी विफलता को पूर्ण पराजय मान लेना एक भयंकर भूल है। विवेकशील व्यक्ति किसी भी स्थिति को जय-पराजय की तराजू में नहीं तौलता है। उसे तो प्रत्येक फल में प्रभु-इच्छा का दर्शन होता है, जिसे वह सहर्ष शिरोधार्य कर लेता है। वह अन्याय के प्रतिशोध में संघर्ष करता है, किंतु फल को स्वीकार कर लेता है। वह संघर्ष को कोसता नहीं है, उसका स्वागत करता है, क्योंकि उससे व्यक्तित्व में निखार आता है। सन्त तुलसीदास कहते हैं, 'सुकृतसेन हारत जितई है' अर्थात् उत्तम कर्म की सेना (शक्ति) हारकर भी जीतती है क्योंकि पुण्य सदा विजयी है। अपने आपको गाली देना, अपने भाग्य को कोसना तुंरत छोड़ दें-यदि आपने जीवन में सुख की ओर बढ़ने का संकल्प किया है। प्रत्येक स्थिति में प्रसन्न रहना मानों दुर्भाग्य को भी चुनौती देना है। वह इन्सान क्या जो ठोकरें नसीब की न सह सके। दरियाए तूफान में किश्ती छोड़कर उस मालिक के सहारे मौज और मस्ती में रहना चाहिए।'मुसीबत में बशर में जौहरे मर्दाना खिलते हैं, मुबारिक बुजदिलों को गर्दिशे किस्मत से डर जाना।' मुसीबत की चुनौती स्वीकार कर उसका डटकर मुकाबला करना चाहिए। परीक्षा के समय भाग खड़े होना अथवा रोने लगना कायरता है। लोग जिसे सौभाग्य कहते हैं, वास्तव में वह परिश्रम का फल होता है, अवसर का सदुपयोग होता है। जिंदगी हिम्मत का सौदा है। प्रयत्न करने पर भी बार-बार विफल होने के कारण जब दिल टूट रहा हो, तब भी गिर-गिरकर अपने को संभालकर उठ खड़ा होना चाहिए और संकट की चुनौती को स्वीकार करके आगे बढ़ते रहना चाहिए। हिम्मत हारकर मनुष्य संतुलन और विवेक खो बैठता है तथा विषय परिस्थित को अधिक विषय बना देता है। साहस, संतुलन और विवेक द्वारा ही गंभीर संकट का दृढ़तापूर्वक सामना किया जा सकता है। वज्र संकल्प लेकर उठे और हिम्मत से आगे बढ़े। जीवन का प्रवाह सदैव गतिमान रहता है तथा व्यक्ति एवं स्थिति स्थिर नहीं रह सकते हैं। जो आगे नहीं बढ़ रहा है, वह पीछे या इधर-उधर हट रहा है तथा पतन के समीप जा रहा है। इन्सान को हिम्मत से आगे ही आगे बढ़ते रहना चाहिए। जीवन में साहस और धैर्य ज्ञान की अपेक्षा अधिक उपयोगी सिद्ध होते हैं। धैर्य का अर्थ है, शान्तिपूर्वक कष्ट सहन करना तथा पुनः प्रयत्न करना। अपनी मंजिल तय करते हुए लक्ष्य की ओर हौसले से आगे बढ़ते रहने में ही जीवन का सुख छिपा पड़ा है।'मंजिल पै जिन्हें जाना है, शिकवे नहीं करते, शिकवों में जो उलझे हैं, पहुँचा नहीं करते।' एक कहावत है-'हिम्मते मरदाँ, मददे खुदा।' हिम्मत करनेवाले को ही प्रभु की सहायता मिलती है। जब मित्र तथा संबंधी वचन और आश्वासन देकर भी धोखा करें, इससे हम मन में आघात न मानें बल्कि संसार में यथार्थ रूप को समझें, स्वार्थरत जगत् को समझें और जीवन की वास्तवकिता को स्वीकार करें। विचित्र विडम्बना तो यह है कि उन धोखा देनेवाले बहुरूपियों से भी स्थायी लड़ाई मेल नहीं ली जा सकती है और सावधान रहते हुए फिर उनके साथ काम चलाना पड़ता है। सत्पुरुष मन में कटुता नहीं आने देते हैं। यदि कोई वस्तु टूट जाय अथवा खो जाय अथवा कोई क्षति हो जाय, उस पर क्लेश करना भी सुख-वृत्ति को लात मारना है। यदि बच्चे या नौकर से कुछ टूट गया, तो बस घर में उस पर आपत्ति आ गयी और कोहराम मच गया। यह मूर्खता त्याज्य है। अपने से छोटे, अपने अधीनस्थ एवं आश्रित जन के साथ बड़ा होने के कारण कठोर व्यवहार करना सबको आपका विरोधी बना देगा। जहाँ संकेतमात्र से अथवा मुस्कान मात्र से आज्ञा-पालन हो रहा हो, वहाँ मुँह चढ़ाकर तथा घुड़ककर आज्ञा देना नासमझी है। चतुर सवार घोड़े को मामूली लगाम हिलाने से मुड़ने, चलने और रुकने का आदेश दे देता है तथा मूर्ख सवार चाबुक मार-मारकर उसे चाबुक की आदत डाल देता है। आपके अधीनस्थ जन, (घर में या दफ्तर में) आपके छोटे भाई, बहन, बच्चे और परिचायक आपसे प्रेम करना चाहते हैं, आपका कृपा-पात्र बनना चाहते हैं और संबंध को प्रगाढ़ करना चाहते हैं, किंतु आप उन्हें दुर्नीति एवं दुर्व्यवहार से अपना विरोधी बना देते हैं। उनको उचित आदर दें, उनके मन में अपने प्रेम की मोहर लगा दें तथा मधुरता से उन्हें जीतकर ही उनसे काम करायें। छोटा समझकर उपेक्षा करना भूल है।'रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजिअ डार, जहाँ काम आवै सुई कहा करै तलवार।' एक छोटा-सा तिनका आँख में या दाँत में घुसकर परेशान कर सकता है।

भाग्यशाली हैं

भाग्यशाली हैं वे लोग, जिन्हें चिन्ता करने को भी फुरसत नहीं मिलती और जो उत्तम लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अपने जीवन को भी अल्प मानते हैं तथा अभागे हैं वे लोग, जो कार्य के अभाव में पर-निंदा जैसी विध्वंसात्मक बातों में तथा व्यसनों में समय नष्ट करते हैं या काल्पनिक दुखों में ही पड़े रहते हैं। व्यस्त रहनेवाले ही जीवन में कुछ कर पाते तथा व्यस्त रहनेवाले ही अधिक काम के लिए ही समय निकाल लेते हैं जब कि निठल्ले लोगों को आलस्य से ही फुरसत नहीं मिलती जिसे काम मिल गया, मानों उसे राम मिल गया। वास्तव में कार्य-भार हमें नहीं थकाता; अरुचि, चिन्ता और भय थकाते हैं। हाँ, आवश्यक दैनन्दिन कार्यों की सूची डायरी में लिख लेनी चाहिए तथा कार्य संपन्न होने पर उसे डायरी में काट देना चाहिए। मस्तिष्क पर फालतू बोझ नहीं डालना चाहिए।
हमें मित्रों के साथ तथा परिवार के बीचे में रहने के लिए भी कुछ समय अवश्य निकालना चाहिए, जब हम हास्य-विनोद और मनोरंजक चुटकुलों से मन को प्रफुल्ल कर सकें। परिवार एवं मित्रवर्ग के संग-साथ में कुछ समय देते रहने से उनके साथ सद्भावना बनी रहती है। परिवार एवं मित्रवर्ग के साथ सामंजस्य हुए बिना मनुष्य को बाह्य जगत् में सुयश पाकर भी कदापि शांति नहीं मिल सकती है। मित्र हमें फँसने और फिसलने से बचाता है और दुख में सच्चा सहारा होता है। प्रकृति के सम्पर्क में आना तथा कभी- कभी मित्रों अथवा परिवार के साथ भ्रमण और विहार के लिए कहीं दूर जाना खोयी हुई स्फूर्ति को पुनः वापस ला देता है।
हमारे व्यवहार में, विशेषतः हमारी उन्नति होने पर, अंहकार की दुर्गन्ध नहीं आनी चाहिए। हमारा विनम्र और मधुर व्यवहार हमें न केवल आदर-सत्कार सुलभ कर देगा, बल्कि हमें सुख और शांति भी प्रदान करेगा।
निर्धनता के कारण उत्पन्न हीन-भावना हमें सता सकती है। उसका उपाय पुरुषार्थ है। कल की चिन्ता तो न करें किंतु योजनापूर्वक पुरुषार्थ करें। आलस्य के कारण धन न कमाने पर, भूखे-नंगे रहकर दुर्दशा में पड़े रहना और दीनता को संयम अथवा सादगी कहना भयंकर भूल है।'नास्ति सिद्धिरकर्मणः।' बिना कर्म किये हुए, बिना पुरुषार्थ किये हुए, कोई सिद्धि नहीं होती है। भोगवृत्ति तो बुरी है, किंतु सबको मानसिक परिपक्वता के लिए आयु के अनुसार तथा सामाजिक स्तर के अनुरुप आवश्यक पदार्थों का उपलब्ध होना भी अभीष्ट होता है, अन्यथा हीनता की भावना आ घरेती है। हाँ, धीरे-धीरे भोगों में से गुजरकर भोग से त्याग की ओर बढ़ना तथा भोगों के आकर्षण से छूटना भी व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक होता है।
कठिनाइयों का बहाना लेकर, हाथ पर हाथ रखकर बैठनेवाले व्यक्ति का इस संघर्षमय संसार में जीने का अधिकार नहीं है। आलस्य छोड़कर, दृढ़ सकंल्प लेकर, लक्ष्य-पूर्ति के लिए लगनपूर्वक जुट जानेवाला व्यक्ति कठिनाई के राक्षस को ललकारकर चुनौती दे देता है और उस पर विजय पा लेता है। दुर्गम शिखरों पर चढ़ जाना अद्भुत विजयोल्लास देता है, जिसका बोध आलसी एवं कायर को कभी नहीं होता है। उत्तम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बहुत दूर तक चलना है, बहुत आगे तक जाना है, इसलिए सामने आये हुए क्षणिक और क्षुद्र प्रलोभनों से ठगे न जाएँ तथा समय नष्ट न करते हुए लक्ष्य-पूर्ति की दिशा में बढ़ते रहें। सुविधा के स्वर्ग में रहने की अपेक्षा कठिनाई के नरक को स्वर्ग बना देना मानव के लिए कहीं अधिक गौरवपूर्ण हैं।
हमें धन को विशेष महत्व न देना चाहिए, न किसी व्यक्ति को केवल धन संग्रह कर लेने के कारण ही कोई विशे, महत्व देना चाहिए।'बैंक बैलेन्स' बढ़ाने का चाव हमें अमानुषिक बना देता है। धन साध्य नहीं है। धन से न महानता प्राप्त होती है, न सुख। धन स्वयं एक समस्या है और प्रायः धन पाकर लोग असन्तुलित हो जाते हैं, मानवता खो बैठते हैं, अपने लिए तथा समाज के लिए दुखदायी हो जाते हैं। धन एक वरदान है तथा अभिशाप भी। यह आप पर निर्भर है कि धन वरदान सिद्ध होता है अथवा अभिशाप। क्या धन के बिना भी आपका कोई अपना महत्व है? धन एक अभिशाप है, यदि व्यक्तित्व खोखला है। धन एक वरदान है यदि आप उसका सदुपयोग करना जानते हैं। धन का सदुपयोग आपको तथा समाज को सुख दे सकता है। उचित प्रकार से पर्याप्त धनार्जन करना और परिश्रम के बाद जो कुछ मिले, उसमें संतोष करना सब प्रकार से हितकर होता है। स्वाभिमान एवं आत्मसम्मान के नाम पर मिथ्या अहंभाव जगाना मानसिक क्लेश का कारण बन जाता है। झूठी शान सदा दुःख देती है। समझदार व्यक्ति झूठी अकड़ के कारण अपना काम नहीं बिगाड़ता है। कभी-कभी 'मूँछे नीची, झण्डा ऊँचा' को मानकर कार्य सिद्ध कर लेना चाहिए। हनुमान से सुरसा के साथ यही नीति अपनाकर उस पर विजय पायी और कार्य-सिद्धि की। झूठी शेखी में आकर न जाने कितने लोग दुर्गति को प्राप्त होते हैं। झूठी शेखी में आकर गरम कॉपी एकदम पी लेने पर प्राण गँवाने जैसी अनेक घटनाएँ घटती रहती हैं। झूठी शेखी ने अगणित घर बरबाद कर दिये।'सकल सोक दायक अभिमाना।' उचित मात्रा में धन कमाकर दान के द्वारा रिक्त होना तथा सादगी के आदर्श की ओर बढ़ना महानता है, किंतु आलस्य के कारण स्वयं मरना तथा दूसरों को गाली देना आत्मप्रवंचना है। धन कमाना बुरा नहीं है, धन का दुरुपयोग करना बुरा है, शोषण बुरा है। धन का मोह बुरा है, धन का अंहकार बुरा है। यदि प्रयत्न करने पर भी किसी क्षेत्र में परिस्थिति न सुधरे अथवा प्राकृतिक आघात, दुर्धटना आदि के कारण कोई वास्तविक विवशता हो, तो उसे सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिए और उससे लज्जित अथवा दुःखी होना अव्यावहारिक है।

मेरी हिम्मत देखिये

'मेरी हिम्मत देखिये, मेरा सलीका देखिये,
जब सुलझ जाती है गुत्थी, फिर से उलझा देता हूँ मैं।'
-ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए।
जब तक संकट न आये, उसकी चिन्ता करना निराधार है और जब संकट आ जाए तब भय करना संकट को उग्र करना, काम को बिगाड़ना है। उत्साह से उसका सामना करें। भय संकट को उग्र तथा हमें दीन बना देता है। पहले अपने भय को जीत लें। भय घर में घुसा हुआ हमारा भीषण शत्रु है। भय को भगाओ। भय से संदेह उत्पन्न होता है और वह आत्मविश्वास एवं साहस को तोड़कर शक्ति को चाट जाता है, शक्ति के स्रोत को सुखा देता है। भय के कारण हम घटनाओं एवं व्यक्तियों को भीषण और अपने को असहाय समझ लेते हैं। सौ में से निन्यानबे बार हम व्यर्थ की अनहोनी कल्पनाएं करते रहते हैं, जिनका कोई आधार नहीं होता है। भयानक वस्तुस्थिति की अथवा किसी व्यक्ति की उपेक्षा तो कदापि न करें, किंतु व्यर्थ ही उसे अति-महत्व भी न दें। जीवन एक सतरंगी धनुष के समान विविधताओं से भरा पड़ा है। हमें उसका रस लेना चाहिए तथा कभी उत्साह नहीं खोना चाहिए।
भय हमारी बुद्धि की हार है, हमारे आत्मविश्वास की हार है। मनुष्य सृष्टि का श्रृंगार है, किंतु भयभीत मनुष्य तो सृष्टि का निकृष्टतम वस्तु है। भय एक मिथ्या, काल्पनिक भ्रम है। आत्मविश्वास में अनन्त शक्ति है। वह आपको ऊँचे-से-ऊँचे शिखर पर ले जा सकती है। आत्मविश्वास को जगाना शुरु करें और कुछ दिनों में ही आपमें परिवर्तन आ जायेगा। आत्मविश्वास आस्तिकता का प्रथम चरण है, आत्मविश्वास का अभाव नास्तिकता का प्रारम्भ है।"हाँ, हाँ, मैं क्या नहीं कर सकता हूँ? मैं अवश्य कर सकता हूँ और सफल हो सकता हूँ। मैंने ब़ड़े-बड़े काम किये हैं, और आगे भी कर दूँगा। प्रभु ने मेरा हाथ पकड़ रखा है, प्रभु-कृपा मेरे साथ है।" भय की सीमा नहीं होती है, कहाँ तक भय मानें?"
प्रायः रात्रि के अन्धकार में निद्रा के समय भय और चिन्ता आकर हमें पकड़ लेते हैं। उस समय मन के द्वार में केवल हरिस्मरण का प्रवेश होने दें। मन्त्र-जप पहरेदार की भाँति निद्रा की रक्षा करता है। अनिद्रा होने पर बेचैन न होना चाहिए, क्योंकि बेचैनी से उत्पन्न तनाव अनिद्रा को द्विगुणित कर देता है। इसे भी प्रभु की कृपा से प्राप्त पूजा का सुअवसर मानकर लेटे हुए ही अथवा बैठकर मंत्रजप प्रारंभ कर दें और जप करते ही रहें, जब तक निद्रा न आये। अपने मानसिक मंत्रजप को स्वयं सुनने का प्रयत्न करने से अचिर ही निद्रादेवी आपको अपनी गोद में ले लेगी।'राम भरोस हृदय नहिं दूजा', इसे जप करके देखें। निद्रा लाने के लिए नशीली चीजों का सेवन करना मानों खत्ती से खाईं से गिर जाना है।
कुछ लोग तो अति व्यस्त रहने की शिकायत करते हैं कि वे काम के बोझ से दबे जा रहे हैं। प्रायः अच्छे काम का इनाम और अधिका काम होता है तथा खराब काम करने का इनाम काम न मिलना होता है, किंतु यह शिकायत की बात नहीं है। काम करने से न केवल मनुष्य दक्ष होकर काम पर हावी हो जाता है, बल्कि अन्य लोग भी उसे दक्ष मानकर उससे सलाह लेते हैं और उसका सत्कार करते हैं। काम को बोझ मानने से वह कष्टप्रद एवं शक्तिशोषक हो जाता है तथा रुचि लेने पर वह सुखप्रद बन जाता है। सामान्यतः परिश्रम करके ही अथवा अपने हिस्से का काम करने पर ही आपको भोजन करने का अधिकार है। बिना काम किये हुए धन कमाना, भोजन करना, अनधिकार चेष्टा है। काम तो आपको ही करना है, फिर रोकर क्यों करें, हँसकर क्यों न करें? अपने कार्य को तुच्छ अथवा छोटा मनाना और अपने-आपको कार्य की अपेक्षा बहुत बड़ा समझना चारित्रिक दोष है। काम को तुच्छ अथवा छोटा मानने से कर्तव्यपालन में शिथिलता आ जायगी जो मनुष्य को निकृष्ट बना देगी। प्रस्तुत लघु कार्य को ठीक प्रकार करने से बड़े काम भी स्वयं मिलेंगे और उन्नति का मार्ग स्वयं खुल जायेगा। लगन से काम करनेवाले मनुष्य को गहरा आत्म-संतोष तो सदा मिलता ही है।

अपच और अनिद्रा

अपच और अनिद्रा चिन्ता के कारण उत्पन्न होते हैं तथा चिंता से ये उग्र रूप धारण कर लेते हैं। अनिद्रा में जप करने के लिए बैठ जाएं। बैठकर केवल तटस्थ चिन्तन (अपने विचारों के साथ सहयोग न करते हुए, उन्हें देखते रहना) करने लगना भी मन को शान्त कर देता है। आखिर, मन के विचार तो आपके ही हैं। उनसे आप कब तक डरेंगे? मन के विचारों को, वे कितने भी डरावने क्यों न हों, शांत भाव से तटस्थ होकर बार-बार देखने से, उनकी भीषणता का शमन हो जाता है। मन के साथ समझौता तथा अपने साथ मेल करने का यही एक ढंग है। यदि मन के साथ मैत्री हो गयी, तो आपने रोग और कष्ट पर आधी विजय पा ली। मन के साथ मित्रता करने का अर्थ है, मन को समझकर उसे स्वीकार करना तथा धैर्यपूर्वक उत्तम दिशा देना अथवा उसे जीत लेना। मन को जीतकर मानो आपने एक साम्राज्य जीत लिया।
घृणा, क्रोध, भय, चिन्ता, ईर्ष्या, द्वेष, क्लेश आदि मनोविकार रक्त संचार पर भी कुप्रभाव डाल देते हैं तथा मानसिक विकलता उत्पन्न कर देते हैं। यदि आपको एक बार कोई रोग हुआ था और अब पुनः उसका प्रभाव हो गया है तो आप यह कल्पना एवं चिन्ता न करने लगें कि पुनः रोग उग्र हो जायगा। अब तो आपको आदत पड़ गयी और आप उस रोग का रहस्य जान गये। अतः विश्वास करें कि शीघ्र ही आप उस पर विजय पा लेंगे। सैकड़ों लोग की रोग से मुक्ति होती है, आपकी भी होगी। मन में यह विश्वास दृढ़ कर लें।
'मन के जीते जीत है मन के हारे हार।'
चिन्ता और भय के वेग से रसों का स्राव अवरुद्ध हो जाता है, रक्त-संचार बाधित हो जाता है और पाचन शिथिल हो जाता है। आप जैसा विचार करेंगे, वैसे ही बन जायेंगे। स्वस्थ विचार कीजिये और स्वस्थ बन जाइये। अपनी शक्तियों पर तथा प्रभु-कृपा पर विश्वास कीजिए। चिन्ता और भय को अभी निकाल फेंकिये।
जब भय का राक्षस आपको घेर रहा हो, आप चुपचाप उसको सुन लें। भय आपके सामने आपकी दुर्गति के जिस भयानक काल्पनिक चित्र को प्रस्तुत कर रहा हो, उसे भी देख लें और जरा मन में फैसला कर लें कि आप उसके लिए बिल्कुल तैयार हैं, बस, इस राक्षस के प्राण निकल जायेंगे और तुंरत इसकी मृत्यु हो जायगी। भय के कारण आप तिनके को तलवार समझ रहे हैं, तिल को पहाड़ मान रहे हैं। आपने ही भय को पालकर अपने सीने पर शत्रु को खड़ा कर लिया था। आप ही उसे भगा सकते हैं।
चिन्ता के स्थान पर चिन्तन करें, योजना बनायें और कर्म करें तथा परिस्थितियों का सामना करें। चिन्ता एक काल्पनिक दैत्य है, जिसे हमने स्वयं ही चिपटाया है। चिन्ता हमें क्रियाशील नहीं होने देती तथा हमारी दुर्गति कर देती है। आखिर, पलायन कब तक करेंगे? पलायन के स्थान पर साहसपूर्वक संघर्ष तथा कर्म करना सीखें। उत्साह आपका श्रेष्ठ मित्र है, आत्मविश्वास आपका सहोदर भ्राता है। इनका तिरस्कार न करें।
उलझन और समस्या बाहर संसार में नहीं है, मन में है। बाहर तो केवल परिस्थितियां हैं। उलझनों में फँसकर दम घोट लेने के बजाय उन्हें चुनौती देकर उनसे छुटकारा पा लेना मोक्ष है, मुक्ति है। निश्चिन्त, प्रफुल्ल मन स्वर्ग है तथा उलझा हुआ मन नरक है, जिसके जिम्मेदार हम स्वयं हैं। अपनी उलझनों के लिए दूसरों को उत्तरदायी ठहराकर, दूसरों को कोसकर उलझनों को हल नहीं हो सकता है। हमारी उलझनें हमारे सुलझाने से ही सुलझेंगी। उत्साह, आत्मविश्वास और धैर्य से उलझनें हँसते-हँसते सुलझ जायेंगी। सब कुछ खोकर भी परम मूल्यवान् जीवन तो अभी शेष है, जो वास्तव में सब कुछ है। हमें नये सिरे से शून्य से ही पुनः प्रारम्भ करके चमक उठने के लिए तैयार रहना चाहिए।'हम गिरकर फिर उठ जायेंगे'-यह आत्मविश्वास सुख और समृद्धि का मूलमंत्र है। बाहर की कठिन परिस्थितियों को चिंता को द्वारा मानसिक समस्या बना लेना अविवेक ही तो है। बाह्य स्थिति को वस्तुपरक (आब्जेक्टिव) दृष्टि से ही देखना चाहिए, न कि व्यक्तिपरक (सब्जेक्टिव) बनाकर। कुछ लोग अपनी तथा दूसरों की सुलझी हुई गुत्थी को फिर उलझा देने में निपुण होते हैं।

पश्चात्ताप छोड़ दें

सब प्रकार के पश्चात्ताप छोड़ दें। भूलों पर पछतावा करते रहने से शक्ति कुण्ठित होती है। अपनी पुरानी भूलों को पाप की संज्ञा देकर अपने को पापी एवं कलंकित मान बैठना और आत्मग्लानि की दलदल में धँसे रहा महापाप है। भूतकाल को स्वप्न की भाँति मिथ्या समझकर उसके साथ अपना नाता तोड़ दीजिये और वर्तमान को उल्लासमय बनाने का सच्चा प्रयत्न कीजिए। भूल को स्वीकार करने से भूल का अन्त हो जाता है। हाँ, सत्पुरुष अपनी भूल को स्वीकार करने में नहीं हिचकता है, क्योंकि भूल स्वीकार करने से मन हलका होता है तथा सुधार प्रारंभ हो जाता है। भूल मानते ही गलत पग को पीछे हटा लेना तथा भूल करते न रहना शूरवीर का काम है। आगे सँभलकर चलें और आगे बढ़ें। पूर्ण कौन है? किससे कभी भूल नहीं होती? कौन सदैव सफल होता है? भूल अथवा विफलता हो गयी तो आत्मग्लानि की क्या बात है? 'बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ।' दूसरों के सामने रो-रोकर पुरानी भूलों के गीत गाने से भूलों के संस्कार दृढ़ होते हैं, शक्ति का ह्रास होता है तथा उत्साह का क्षय होता है। पुरानी भूलों के स्मरण में उलझे रहने से प्रगति ही अवरुद्ध हो जाती है। सच्चा पछतावा वह है जो दोष को भस्म करके शीघ्र ही स्वयं भी विलुप्त हो जाये तथा आप भविष्य के लिए संकल्प लेकर शांत एवं शीतल हो जायँ और तत्पश्चात् बार-बार भूलों को न याद करें, न दुःख मानें। ग्लैडस्टोन ने कहा था कि कोई मनुष्य बहुत-सी और बड़ी-बड़ी भूलें बिना किये हुए कभी बड़ा या भला नहीं बना। वास्तव में भूलों का अनुभव तो राह का प्रकाश बन जाता है। विश्वास कीजिये, प्रभु उन जघन्य अपराधों को भी क्षमा कर देते हैं जिन्हें मानव अक्षम्य समझता है, यदि आप सच्चे भाव से शरण में आकर पवित्र हो गये हैं।
'सरन गये प्रभु ताहु न त्यागा। विस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥'
प्रभु शरणागत भयहारी हैं।
'कोटि विप्र वध लागहिं जाहू। आये सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होहि जीव मोहि जबही। जन्म कोटि अघ नासहिं तबही॥'
जो व्यक्ति दूसरों को क्षमा कर देता है, वह भूल होने पर अपने को भी क्षमा कर सकता है। जो दूसरों को क्षमा नहीं कर सकता है, वह अपने को भी क्षमा नहीं करता है और वह जीवन को नरक बना लेता है। शोक, विषाद में पड़े रहना अविवेक का परिचायक है। विषाद की काली चादर को आपने स्वयं ही ओढ़ा है। आप इसे उतारकर फेंक सकते हैं। यदि सन्तों का भूलकाल दिव्य है तो कथातथित पापी का भविष्य भी दिव्य हो सकता है। पुराने अपराधों की स्मृति का विवेकपूर्ण शमन (दमन नहीं) करने से आप अतीत से मुक्त हो सकते हैं। सच्चा पछतावा वह है, जिससे निर्मल जीवन का उदय हो।
रोग होने पर रोग की चिन्ता करना उसे द्विगुणित कर देता है। रोग का उपाय अवश्य करना चाहिए, किंतु रोग का चिन्तन एवं उसकी बार-बार चर्चा करना और रोग से भयभीत होकर जीवन को सड़ा देना मूर्खता ही है। रोग के 'मूड' में रहने से रोग बढ़ता ही है। होम्योपैथी, एलोपैथी आदि से बढ़कर लाभकारी 'एपेथी' (रोग की परवाह न करना है) है।'राम कृपा नासहिं सब रोगा।' कुछ लोग नाजुक-मिजाजी में रोग बना रहना चाहते हैं। यह उनके लिए एक शान की बात होती है। ऐसे लोगों से सदा बचते रहें। उनके सम्पर्क से काल्पनिक रोग लगते हैं।'मेरे एक पूर्वज इसी रोग से मर गये थे'-ऐसा तर्क मूर्खतापूर्ण होता है। अमुक व्यक्ति जैसे रोग के लक्ष्ण कहीं मुझमें तो नहीं है, कहीं मुझमें भी वह रोग तो नहीं आने लगा है, इस प्रकार अपने को दूसरे रोगियों के समान रोगी समझने लगना अथवा रोग के लक्षणों की मिथ्या कल्पना करना भयंकर भूल है। यदि आप चिकित्सक नहीं है तो व्यर्थ ही रोगों की सविस्तार जानकारी करने का प्रयत्न न करें, क्योंकि रोगों की जानकारी करते हुए आप अपने भीतर भी रोगों की मिथ्या कल्पना कर सकते हैं। ऐसे चिकित्सक को दूर रखें जो रोग को 'भयंकर' कहकर उसे असाध्य बना देता है।'आप बहुत सोचते हैं, मन में ताना-बाना बुनते रहते हैं, आपको भारी हृदय-रोग हैं, आपकी चिकित्सा करना कठिन है'-इत्यादि बातें अविवेकी चिकित्सक कहते हैं। किसी रोगी से अपनी तुलना न करें, स्वस्थ व्यक्तियों से प्रेरणा लें। प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति अलग-अलग होती है। आशा और विश्वास रखने से तथा प्रबल इच्छा-शक्ति से भयंकर रोग भी ठीक हो जाते हैं। अतः ऋणात्मक चिन्तन करना सर्वथा त्याज्य है। अपने स्वस्थ हो जाने में तथा स्वस्थ रहने में अनन्त और अखंड विश्वास रखें। जीवन के प्रति आस्था, उत्साह और विश्वास मनुष्य को सदा तरुण बनाये रखते हैं।

विवेक

विवेक (सत्य का निर्धारण करना, ठीक और गलत का विचारपूर्वक भेद करने की शक्ति, गहरी समझदारी) का मूल्य पुस्तकीय ज्ञान से बढ़कर होता है। नियम-संयम मनुष्य के द्वारा ही मनुष्य के हित में बनाये गये हैं। बाधक हो जाने पर उसका संशोधन एवं परित्याग करना भी आवश्यक हो सकता है। नियम मनुष्य को जकड़ने और कुचलने के लिए नहीं है, विकास के लिए हैं। व्यक्तित्व का विकास होने पर अतिसंयम असंयम बन जाता है और अवरोधक हो जाता है। भीषण ज्वर में स्नान का आग्रह करना दुराग्रह ही है, यद्यपि स्नान करना लाभकारी होता है। साधारणतः वचनपालन धर्म्य हैं, किंतु अज्ञान एवं अबोधता अथवा धर्मान्धता में दिये गये वचन का पालन घातक और मूर्खता का परिचायक हो सकता है। (महाभारत में युधिष्ठिर के गाण्डीव धनुष को निकृष्ट कहते ही अर्जुन ने प्रतिज्ञापालन हेतु उन्हें मारने के लिए धनुष उठा लिया, किन्तु श्रीकृष्ण ने उन्हें ऐसा करने से यह समझाकर रोका कि वह प्रतिज्ञा ही अज्ञतापूर्ण थी तथा उसका समाधान अन्य प्रकार से हो सकता है। ) विवेक को त्यागकर धर्म भी धर्म नहीं रहता है। बदली हुई परिस्थिति में, अवसर के अनुरुप, दुराग्रह छोड़कर अपने निर्णय एवं निश्चय को बदल देना व्यावहारिक होता है।'प्राण जाँहि पर वचन न जाँही' सब स्थानों पर लागू नहीं होता है। जीवन के अनेक क्षेत्रों में, विशेषतः राजनीति में, कोई निर्णय अन्तिम निर्णय नहीं होता है। अनेक बार राष्ट्र के हित में युद्ध और संधि की जाती हैं, जो पूर्व निर्णय के विपरीत होती है। विवेक का सदुपयोग करना ईश्वरीय शक्ति का सदुपयोग होता है।
मनुष्य में जीने की इच्छा मृत्यु की लालसा से अधिक बलवती होती है। जीवन एक उल्लास है। तूफानी खुशी का दूसरा नाम जिन्दगी है। जीवन का गहरा, सच्चा और स्थायी सुख कब मिलता है? दूसरों के सुख के लिए जीने से। दूसरों को सुख देनेवाला व्यक्ति कभी दुःखी नहीं हो सकता है।'न हि कल्याणकृत् कश्चित् दुर्गतिं तात गच्छति' (गीता) अर्थात् दूसरों के सुख के लिए जीनेवाल व्यक्ति कभी दुःखी नहीं होता है। अपना अपमान अथवा अपनी हानि करनेवालो के भी दुःख में सुख ढूँढ़नेवाला कभी सुखी नहीं हो सकता। जीवन का सत्कार करनेवाला सबसे प्रेम करता है, सबको यथाशक्ति, यथासम्भव सुख देने का प्रयत्न करता है। मानवमात्र के प्रति प्रेम करना ही मानव का सबसे ब़ड़ा बल है। जीवन दीर्घ हो या लघु, महान् होना चाहिए। सबसे प्रेम करनेवाला, सबको सुख पहुँचानेवाला व्यक्ति सबसे बड़ा है। अच्छी प्रकार जिया हुआ लघु जीवन निरर्थक दीर्घ जीवन की अपेक्षा अधिक अच्छा है। जब तक जीवन रहे, समस्त भय छोड़कर सबको सुख देते रहें। प्रभु से अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए प्रार्थना करें। दूसरों की मंगलकामना करे से अपना भी मंगल हो जाता है। सबके लिए जीनेवाला व्यक्ति मरकर भी अमर रहता है। दूसरों के लिए जीना, दूसरों के लिए प्रार्थना करना, दूसरों के सुख के लिए स्वयं दुःख उठाना, सच्चे सुख की सच्ची राह है।
प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कुछ समय के लिए अकारण ही मानसिक उदासी और उत्फुल्लता का दौर आता रहता है। उदासी के दौर में निराशा को घर करने न देना चाहिए तथा समझ लेना चाहिए कि वह दौर स्वयमेव निकल जायगा। उत्फुल्लता के दौर में किसी उत्तम कर्म में जुट जाना चाहिए।