Wednesday, March 21, 2012

मैं हूँ

क्या मैं आप से पुछू कि जिसे आप खोज रहे है, क्या वह आप से दूर है ? जो दूर हो उसे खोजा जा सकता है, पर जो स्वयं आप हो, उसे कैसे खोजा जा सकता है ? 
जिस अर्थ में शेष सब खोजा जा सकता है, स्व उसी अर्थ में नहीं खोजा जा सकता है ! वहाँ जो खोज रहा है, और जिसे खोज रहा है, उन दोनों में दूरी जो नहीं है ! संसार की खोज होती है, स्वयं की खोज नहीं होती है ! और जो स्वयं को खोजने निकल पड़ते है, वे स्वयं से और दूर ही निकल जाते है ! 
यह सत्य ठीक से समझ लेना आवश्यक है, तो खोज हो भी सकती है ! संसार को पाना हो तो बाहर खोजना पड़ता है और यदि स्वयं को पाना हो तो सब खोज छोड़ कर अनुदिव्ग्न और स्थिर होना पड़ता है ! उस पूर्ण शांति और शून्य में ही उसका दर्शन होता है, जो कि मैं हूँ ! 

Saturday, March 17, 2012

सत्य


सत्य तो नहीं सिखाया जा सकता पर सत्य को जानने कि विधि सिखाई जा सकती है ! .......इस विधि की कोई चर्चा नहीं है ! सत्य की चर्चा तो बहुत है ! पर सत्य-दर्शन की विधि की चर्चा नहीं है !
इस से बड़ी भूल नहीं हो सकती है !
यह तो प्राण को छोड़ देह को पकड लेने जैसा ही है ! इसके परिणाम स्वरूप ही धर्म तो बहुत है, धार्मिकता धर्म नहीं है ! आज जो संप्रदाय धर्म के नाम पर चलते दीख रहे है, वे धर्म नहीं है ! धर्म तो एक ही हो सकता है ! उसमे विशेषण नहीं लग सकता ! वह तो विशेषणशून्य है !
धर्म यानि धर्म वह 'यह' धर्म और 'वह' धर्म नहीं हो सकता है !
जहाँ 'यह' और 'वह' है, वहां धर्म नही है !

Friday, March 16, 2012

दर्शन की शक्ति


जो दृष्टा है, जो दर्शन की शक्ति है, उसका स्वयं दृश्य की भांति दर्शन नहीं हो सकता है ! विषय (Subject) कभी भी विषयी (Object) में परिणत और पतित नहीं हो सकता ! यह सरल सी, सीधी सी बात ध्यान में न आने से सारी भूल हो गई है ! परमात्मा की खोज होती है, जैसे वह कोई बाह्रा वस्तु है ! उसे पाने के लिए पर्वतो और वनों की यात्राये होती है, जैसे वह कोई बाह्रा व्यक्ति है ! यह सब कैसा पागलपन है ? उसे खोजना नहीं है, जो खोज रहा है, उसे ही जानने से वह मिल जाता है ! वह वही है ! खोज में नहीं, खोजने वाले में ही वह छिपा है !
सत्य आपके भीतर है ! सत्य मेरे भीतर है ! वह कल आपके भीतर नहीं होगा, वह इसी क्षण अभी और यही आपके भीतर है ! मैं हूँ यह होना ही मेरा सत्य है ! और जो भी मैं देख रहा हूँ, वह हो सकता है कि सत्य न हो, हो सकता है कि वह सब स्वप्न ही हो, क्योंकि मैं स्वप्न भी देखता हूँ और देखते समय वे सब सत्य ही ज्ञात होते है ! यह सब दिखाई पड़ रहा संसार भी स्वप्न ही हो सकता है ! आप मेरे लिए स्वप्न हो सकते है ! हो सकता है कि मैं स्वप्न में हूँ और आप उपस्थित नहीं है ! लेकिन देखने वाला दृष्टा असत्य नहीं हो सकता है ! वह स्वप्न नहीं हो सकता है, अन्यथा स्वप्न देखना उसे संभव नहीं हो सकता था !

Tuesday, March 13, 2012

शान्त परिस्थिति

इस शान्त परिस्थिति में......और आप को इस शान्त मन:स्थिति में मैं अवश्य ही वह कह सकूंगा. . .जो मैं कहना चाहता हूँ कि सबको कह दूँ, लेकिन बहरे हृदयों को देखकर अपने को रोक लेना पड़ता है !
सत्य की साधना के लिये चित्त की भूमि वैसे ही तैयार करनी होती है, जैसे फूलो को बोने के लिये पहले भूमि को तैयार किया जाता है !
पहला सूत्र: वर्तमान में जीना ! (Living in the Present) अतीत और भविष्य के चिंतन की यांत्रिक धारा में न बहे ! उसके कारण वर्तमान का जीवित क्षण (Living moment) व्यर्थ ही निकल जाता है ! जबकि केवल वही वास्तविक है ! न अतीत की कोई सत्ता है, न भविष्य की ! एक स्मृति में है, एक कल्पना में ! वास्तविक और जीवन केवल वर्तमान है ! सत्य को यदि जाना जा सकता है, तो केवल वर्तमान में होकर ही जाना जा सकता है !

Wednesday, February 29, 2012

अर्थ नहीं

हम सब अपने आपको आलोक से भरे तो ही वह प्रभात निकट आ सकता है ! उसकी संभावना को वास्तविकता में परिणत करना हमारे हाथो में है !
हम सब भविष्य के उस भवन की ईंटें है ! और, हम ही है वे किरणे जिनसे उस भविष्य के सूरज का जन्म होगा ! हम दर्शक नहीं, सृष्टा है !
और, इसलिए वह भविष्य का ही निर्माण नहीं, वर्तमान का ही निर्माण है ! वह हमारा ही निर्माण है ! मनुष्य स्वयं का ही सृजन करता है ! व्यक्ति ही समिष्ट की इकाई है ! उसके दुवारा ही विकास है और क्रांति है !
वह इकाई आप है !
इसलिए, मैं आपको पुकारना चाहता हूँ ! मैं आपको निद्रा से जगाना चाहता हूँ !
क्या आप नहीं देख रहे है कि आपका जीवन एक बिलकुल बेमानी, निरर्थक और ऊब देनेवाली घटना हो गया है ? जीवन ने सारा अर्थ और अभिप्राय खो दिया है ! यह स्वाभाविक ही है ! मनुष्य के भीतर प्रकाश न हो तो उसके जीवन में अर्थ नहीं हो सकता है !

Wednesday, February 8, 2012

भगवान् के दर्शन कैसे होते है ?

* यह 'दर्शन' शब्द भ्रामक है ! इससे ऐसा प्रतिध्वनित होता है कि जैसे भगवान् कोई व्यक्ति है, जिसका दर्शन होगा और ऐसे ही 'भगवान्' शब्द ही व्यक्ति भ्रम देता है ! भगवन कोई नहीं है, केवल भगवान् है ! व्यक्ति नहीं है, शक्ति है ! शक्ति का अनंत सागर है : चैतन्य का अनंत सागर है...वही सब रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है ! वह भगवान् सृष्टा (Creater) की भांति अलग नहीं है....! वही है सृष्टि.......वही है सृजनात्मकता (Creativity) जीवन वही है ! 'अहम' (EGO) से घिरकर हम इस 'जीवन' (Life) से भिन्न होने का आभास कर लेते है ! वही प्रभु से हमारी दुरी है; यूँ वस्तुत: दुरी असंभव है ! अहम् से, 'मैं, से पैदा हुआ आभास ही दुरी है ! यह दुरी अज्ञान है : वस्तुत: दुरी नहीं है, अज्ञान ही दुरी है ! 'मैं' मिट जाये तो अनंत अपरिसीम सृजनात्मक जीवनशक्ति का अनुभव होता है........वही भगवान् है ! 'मैं' की शुन्यता पर जो अनुभव है, वही ' भगवान् ' का दर्शन है ! मैं क्या देख रहा हूँ कि 'मैं' कही भी नहीं है.......और जो सागर की लहरों में है वही मुझमें है' जो स्वयं बसंत में नयी फूटती कोपलो में है, वही मुझमे है, जो पतझर में गिरे पत्तो में है, वही मुझमें है...मैं विश्वसत्ता से कही भी टुटा और पृथक नहीं हूँ : उसमें हूँ, वही हूँ....यही अनुभव प्रभु--साक्षात् है !

Thursday, November 3, 2011

बापू के नाम

सुखदायक सिद्ध बापू के नाम का अमृत पी
दुख: से व्याकुल मन तेरा भटके ना कभी
थामे सब का हाथ वो, मत होई ये भयभीत
मोटेरा  वाला परखता संत जनों की प्रीत
बापू की करुणा के खुले शत-शत पावन द्वार
जाने किस विध हो जाये तेरा बेडा पार
जहाँ भरोसा वहाँ भला शंका का क्या काम
तु निश्चय से जपता जा बापू नाम अविराम
ज्योर्तिमय बापू साधना नष्ट करें अंधकार
अंतःकरण से रे मन उसे सदा पुकार
बापू के दर विश्वास से सर झुका नही इक बार
किस मुँह से फिर मांगता क्या तुझको अधिकार
पग – पग काँटे बोई के पुष्प रहा तू ढूंढ
बापू नाम के सादे में ऐसी नही है लूट
मीठा – मीठा सब खाते कर-कर देखो थूक
महालोभी अतिस्वार्थी कितना मूर्ख तू
न्याय शील सिद्ध बापू से जो चाहे सुख भी
उसके बन्दो तू भी न्याय तो करना सीख
परमपिता सत जोत से क्यूं तूं कपट करे
वैभव उससे मांग कर उसे भी श्रद्धा दे
बापू तेरी पारबन्ध के बदले है सत्यालेक
कभी मालिक की ओर तू सेवक बनकर देख
छोड़ कर इत उत छाटना भीतर के पट खोल
निष्ठा से उसे याद कर मत हो डाँवाडोल
बापू को प्रीतम कह प्रीत भी मन से कर
बीना प्रीत के तार हिले मिले ना प्रिय से वर
आनन्द का वो स्त्रोत है करुना का अवतार
घट घट की वो जानता महा योगी सुखकार